आत्महत्या – क्यों? क्या करें?
आईआईटी के तीन छात्रों द्वारा की गई दुखद आत्महत्याओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़े भी समान रूप से चिंताजनक हैं कि हर साल दस लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं। यह आंकड़ा युद्धों और हत्याओं के कारण होने वाली कुल वार्षिक मौतों से अधिक है। डब्ल्यूएचओ इस परेशान करने वाले वैश्विक रुझान-दूसरों की तुलना में खुद से अधिक लोगों के मारे जाने को-एक दुखद सामाजिक स्वास्थ्य समस्या कहता है।
भगवद-गीता (16.8-9) बताती है कि आध्यात्मिक अज्ञान और भौतिक आसक्ति आत्म-विनाशकारी मानसिकता का कारण हैं। अनुभवजन्य निष्कर्ष आध्यात्मिकता और आत्महत्या के बीच व्युत्क्रम संबंध को सही ठहराते हैं। हाल के समय में बढ़ती आत्महत्या दर भौतिकवादी उद्देश्यों पर अत्यधिक जोर देने और आध्यात्मिकता के संबंधित अस्वीकृति या उपेक्षा के साथ-साथ हुई है। समाजशास्त्रीय सर्वेक्षणों से पता चलता है कि आध्यात्मिक विचारधारा वाले लोग अपने भौतिकवादी समकक्षों की तुलना में बहुत बेहतर मानसिक स्वास्थ्य का आनंद लेते हैं।
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